हमारी हक़ की और ज़ुल्म ज्यादती की इस लड़ाई में आवाज़ में आवाज़ मिलाइये-शहबाज़ रशादी
आज़मगढ़ के इंसाफ पंसद भाइयो क्या आप को मालूम है भारतीय राजनीति इस वक़्त पतन के आखरी पायदान पर है यह आप सब से छुपा नही है। सरकार द्वारा लाये गए काले कानून की आंच पूरे देश मे होती हुई हमारे शहर आज़मगढ़ भी पहुँची औऱ जैसा कि इस कायर सरकार से उम्मीद थी यहां भी आवाज़ों को दबाया गया।
5 फरवरी को बिलरियागंज में 4 बजे प्रातः में CAA NPR NRC के ख़िलाफ़ जौहर पार्क में प्रदर्शन कर रही निहत्थी औरतों पर लाठी चार्ज किया गया। और बेकसूर मर्दों नौजवानों के ऊपर संगीन धाराओं मुक़दमा कर के जेल में ठूस दिया गया।
न महिला पुलिस बुलाई गई न ही संयम बरता गया। दमन करना था, दमन किया गया। यह दमन चलता रहेगा, यह तब तक नही रूकेगा जब तक आप नही रोकेंगे।
यह लोकतंत्र है, यहाँ सिर्फ सिर गिने जाते हैं। राजनीति में अगर आपका प्रतिनिधित्व नही होगा तब तक दमन होता रहेगा। मगर एक मुश्किल है। आप जब भी अपना प्रतिनिधि चुनते हैं वो आपके बीच से नही होता। इसलिए एक वक्त के बाद आप फिर उसी हालात पे पहुँच जाते हैं।
ज़रा सोचिए अगर मुसलमानों की आवाज़ ही उठाना है तो अपनी क़यादत क्यों नही?
भारतीय जनता पार्टी ने इतना ज़हर दाढ़ी और टोपी के खिलाफ फैलाया है तो वो इसलिए क्योंकि आप दाढ़ी और टोपी से बचते हैं। आपको शर्म आती है मौलाना ताहिर मदनी को अपना नेता कहते हुए, आप खुद को शर्मिंदा महसूस करते हैं आपने आप को एक मुस्लिम नाम वाली पार्टी का समर्थक बताते हुए तो आप से और क्या उम्मीद कर रहे हैं?
सरकारें हिन्दू या मुसलमान की सियासत नही कर रही हैं। वोट बैंक की सियासत कर रही हैं। जिस दिन आप अपना वोट दिखा देंगे उस दिन यही राजनीतिक दल आपके लिए सोचने लगेंगे।
आज अगर मौलाना ताहिर मदनी जेल में हैं तो किसके लिए हैं? आज अगर मौलाना आमिर रशादी आवाज़ उठा रहे हैं तो किसके लिए? आज अगर भाई नुरूलहुदा 25000 के इनामी हो गए तो किसके लिए?
मौलाना ताहिर मदनी हों या मौलाना आमिर रशादी, वो तो आपके लिए खड़े ही हैं। मगर इस वक़्त उन्हें भी आपकी ज़रूरत है। आपके साथ की, आपके हौसले की। ये सेक्युलर बनने का ढोंग बन्द कीजिये। अपनी विचारधारा को खुलकर सामने लाइये। ये गांधी का देश है, ये अब्दुल कलाम का देश है। डरना किस्से है? साबित क्या करना है?
हमारी हक़ की और ज़ुल्म ज्यादती की इस लड़ाई में आवाज़ में आवाज़ मिलाइये, वक़्त बदलेगा , आप बदलेंगे , आप की सियासत बदलेगी ।
शहबाज़ अहमद !
आज़मगढ़ के इंसाफ पंसद भाइयो क्या आप को मालूम है भारतीय राजनीति इस वक़्त पतन के आखरी पायदान पर है यह आप सब से छुपा नही है। सरकार द्वारा लाये गए काले कानून की आंच पूरे देश मे होती हुई हमारे शहर आज़मगढ़ भी पहुँची औऱ जैसा कि इस कायर सरकार से उम्मीद थी यहां भी आवाज़ों को दबाया गया।
5 फरवरी को बिलरियागंज में 4 बजे प्रातः में CAA NPR NRC के ख़िलाफ़ जौहर पार्क में प्रदर्शन कर रही निहत्थी औरतों पर लाठी चार्ज किया गया। और बेकसूर मर्दों नौजवानों के ऊपर संगीन धाराओं मुक़दमा कर के जेल में ठूस दिया गया।
न महिला पुलिस बुलाई गई न ही संयम बरता गया। दमन करना था, दमन किया गया। यह दमन चलता रहेगा, यह तब तक नही रूकेगा जब तक आप नही रोकेंगे।
यह लोकतंत्र है, यहाँ सिर्फ सिर गिने जाते हैं। राजनीति में अगर आपका प्रतिनिधित्व नही होगा तब तक दमन होता रहेगा। मगर एक मुश्किल है। आप जब भी अपना प्रतिनिधि चुनते हैं वो आपके बीच से नही होता। इसलिए एक वक्त के बाद आप फिर उसी हालात पे पहुँच जाते हैं।
ज़रा सोचिए अगर मुसलमानों की आवाज़ ही उठाना है तो अपनी क़यादत क्यों नही?
भारतीय जनता पार्टी ने इतना ज़हर दाढ़ी और टोपी के खिलाफ फैलाया है तो वो इसलिए क्योंकि आप दाढ़ी और टोपी से बचते हैं। आपको शर्म आती है मौलाना ताहिर मदनी को अपना नेता कहते हुए, आप खुद को शर्मिंदा महसूस करते हैं आपने आप को एक मुस्लिम नाम वाली पार्टी का समर्थक बताते हुए तो आप से और क्या उम्मीद कर रहे हैं?
सरकारें हिन्दू या मुसलमान की सियासत नही कर रही हैं। वोट बैंक की सियासत कर रही हैं। जिस दिन आप अपना वोट दिखा देंगे उस दिन यही राजनीतिक दल आपके लिए सोचने लगेंगे।
आज अगर मौलाना ताहिर मदनी जेल में हैं तो किसके लिए हैं? आज अगर मौलाना आमिर रशादी आवाज़ उठा रहे हैं तो किसके लिए? आज अगर भाई नुरूलहुदा 25000 के इनामी हो गए तो किसके लिए?
मौलाना ताहिर मदनी हों या मौलाना आमिर रशादी, वो तो आपके लिए खड़े ही हैं। मगर इस वक़्त उन्हें भी आपकी ज़रूरत है। आपके साथ की, आपके हौसले की। ये सेक्युलर बनने का ढोंग बन्द कीजिये। अपनी विचारधारा को खुलकर सामने लाइये। ये गांधी का देश है, ये अब्दुल कलाम का देश है। डरना किस्से है? साबित क्या करना है?
हमारी हक़ की और ज़ुल्म ज्यादती की इस लड़ाई में आवाज़ में आवाज़ मिलाइये, वक़्त बदलेगा , आप बदलेंगे , आप की सियासत बदलेगी ।
शहबाज़ अहमद !


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