मैं कई सालों से RUC को फॉलो कर रहा हूँ और अपनी हैसियत के हिसाब से उसका समर्थन भी करता आया हूँ।
एक बात बहुत साफ है—RUC को गरियाने वाले या “डेढ़ ज़िले की पार्टी” कहने वाले आपको बाहर के लोग नहीं मिलेंगे, बल्कि अपने ही आज़मगढ़ के लोग मिलेंगे। और सच कहूँ, उन्हें ये कहने का कोई हक नहीं है।
कुछ लोग तंज कसते हैं कि इतने सालों में RUC एक विधायक या सांसद तक नहीं बना पाई। लेकिन सवाल ये है—जब आप खुद ही दूसरों के पीछे खड़े होकर नारे लगाओगे, उनके लिए प्रचार करोगे, उनकी जीत के लिए मेहनत करोगे, और फिर अपनी ही पार्टी को छोटा बताओगे, तो नतीजा क्या निकलेगा?
मुझे वो समय आज भी याद है जब RUC हर मुद्दे पर लोगों के साथ खड़ी होती थी—बिना ये देखे कि चुनाव है या नहीं, कोई फायदा है या नहीं। बिना किसी स्वार्थ के साथ देना, यही इसकी पहचान रही है, और आज भी है।
RUC के लोग कभी किसी को गाली देकर, बदनाम करके या इल्ज़ाम लगाकर वोट नहीं मांगते। न ही ये किसी एक धर्म के नाम पर राजनीति करती है। इसका तरीका साफ है—काम और साथ।
जो लोग आज RUC पर उंगली उठा रहे हैं, उनमें से कई ऐसे हैं जिनकी खुद की हैसियत घर के अंदर एक कप चाय तक तय नहीं कर पाती, लेकिन सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े ज्ञान देते हैं।
और जो “डेढ़ ज़िले की पार्टी” कह रहे हैं, वही लोग कभी RUC के लिए “जिंदाबाद-जिंदाबाद” करते नहीं थकते थे। लेकिन जैसे ही लगा कि अब ज़मीन पर उतरकर मेहनत करनी पड़ेगी, वो चुपचाप किनारे हो गए। आज वही सबसे ज्यादा बोल रहे हैं।
अगर हम इसी तरह एक-दूसरे को गिराते रहे, तो वो दिन दूर नहीं जब बेटा भी अपने बाप की इज़्ज़त नहीं करेगा।
आखिर में बस इतना कहना है—जो लोग RUC को “डेढ़ ज़िले की पार्टी” कहते हैं, वो आगे आएं और मेहनत करके इसे “दो ज़िले की पार्टी” बनाकर दिखाएं।
बाकी, अगर किसी को मेरी बात से दिक्कत है, तो वो उसकी सोच है—मुझे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
Nadeem Ahmad की FB पोस्ट





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