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Saturday, 13 July 2019

सरकार बटला हाउस फिल्म पर रोक लगा कर फर्ज़ी इंकाउन्टर की जांच कराये- अशरफ़ इस्लाही राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल

सरकार बटला हाउस फिल्म पर रोक लगा कर फर्ज़ी इंकाउन्टर की जांच कराये- अशरफ़ इस्लाही
राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल

        आज़मगढ़, आज से दस वर्ष पूर्व 19 सितम्बर 2008 को रमज़ान के महीने मे दिल्ली के बटला हाऊस मे आजमगढ़ के शिक्षा प्राप्त कर रहे दो नौजवान आतिफ अमीन व साजिद को दिल्ली पुलिस ने आतंकवाद का झूठा इल्ज़ाम लगा कर इन्काउंटर मे शहीद कर दिया था और कई को गिरिफतार कर जेलों मे कैद कर दिया। पूरे आजमगढ़ को आतंकवादी बना दिया गया, जनपद के माथे पर आतंकवाद का झूटा धब्बा लगा दिया गया, सब को परीशान किया जाने लगा, हर तरफ डर खौफ का माहौल छा गया, गलियों मे जूतों की टाप सुनाई देती व सड़कों पर बिना नम्बर पलेट की गाड़ियां सायरन बजाती नज़र आतीं और जिसे चाहती जब चाहती उठा लेतीं और आतंकवादी घोषित कर देतीं, बाजारें और चौराहों पर शाम मे ही सन्नाटा छा जाने लगा था। बड़े बड़े नेता, पार्टियां, मसीहा, तंजीमें सब खामोश थे, इस जुल्म के खेलाफ कोई बोलना तो दूर जिले के मुस्लिम नेता व रिश्तेदार कोई किसी को अपना कहने को तय्यार नही था।
       तब एक मर्दे मुजाहिद *मौलाना आमिर रशादी मदनी* की शक्ल मे बाहर आया, कुछ ओलमा व दानिशवरान को साथ लेकर ओलमा कौंसिल नामी तंज़ीम ( जो आज देश भर मे *राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल* के नाम से मशहूर है)   बनाई, इस अन्याय के विरुध आवाज़ उठाई, आतिफ़ साजिद को बेकसूर बताया, इंकाउन्टर को फर्ज़ी और कातिल पुलिस के खेलाफ कारवाई की मांग की। स्पेशल ट्रेन बुक कर हज़ारों जिंदा दिल अवाम दिल्ली से लेकर लखनऊ, सड़क से लेकर संसद तक आवाज़ उठाई, सरकारों व खुफिया एजेंसियों की आंखों मे आंखें डाल कर बात की, और कहा कि अब बस! बहुत हुआ!
       हमारे एक बच्चे का इंकाउन्टर हुआ तो तुमहारा इंकाउन्टर होगा, बुरी नजर डालने वालों की आंखे नोच ली जायेंगी,आखिर गिरिफतारियों का सिलसिला बन्द हुआ, खुफिया एजेंसियों को आजमगढ़ से भागना पड़ा। हालात बदले, लोग कौंसिल के एहसान को भूल कर फिर अपने अपने मे व्यस्थ हो गये और कौंसिल से अलग हो गये। 10 साल से राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल के साथ आतिफ के वालिद *मो0 अमीन* सहित दूसरे आजमगढ़ वासी फर्जी इंकाउन्टर की जांच कर इंसाफ की मांग कर रही है मगर अफसोस उस वक्त की कांग्रेस सरकार से लेकर आज की मोदी सरकार तक इंकाउन्टर की जांच नही करा कर सबका साथ सबका विकास के नारे को छलावा साबित किया। हालांकि अब मामला कोर्ट मे है।
             आज शहीदों के मां बाप, भाई बहन के आंसू धीरे धीरे खुश्क हो रहे थे कि जख्म पर नमक छिड़कने का काम करते हुये जान अब्राहम की *बटला हाउस* नामी फिल्म का ट्रेलर पिछले दिनों सामने आया जिस मे 10 साल बाद एक बार फिर आतिफ व साजिद सहित पूरे आजमगढ़ को आतंकवादी दिखाया गया है। चूंकि कौंसिल ने आजमगढ़ सहित हम सब को जुल्म से लड़ने का हौसला दिया है तो हमारी और आपकी, आजमगढ़ वासियों की एक बार जिम्मेदारी बनती है कि इस फिल्म (जुल्म) के विरुध खड़े हों और फिल्म को रोकने या उसकी कहानी बदलने का दबाओ बनायें। क्यूंकि कोई भी फिल्म जब बनती है तो उस का मकसद होता है कि उसमे  देश व समाज के लिये एक अच्छा संदेश हो, ना कि किसी मजहब या समुदाय को गलत दिखाना। यह फिल्म मुसलमानों व आजमगढ़ को आतंकवादी बता रही है इस लिये हमे इस को *रिलीज़ होने से रोकना* होगा। जिस चीज़ का मामला कोर्ट मे हो उस पर फिल्म तो दूर कुछ भी करना उचित नही है इस लिये कोर्ट इस पर रोक लगाये और बनाने वालों के विरुध कारवाई करे।

अशरफ़ इस्लाही
राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल

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