Breaking

Friday, 19 September 2025

17 साल का दर्द… 17 साल का इंतज़ार

 17 साल का दर्द… 17 साल का इंतज़ार 


19 सितम्बर 2008 – बटला हाउस का वो काला दिन, जब आज़मगढ़ के मासूम नौजवानों को दहशतगर्द बता कर क़त्ल कर दिया गया।


उसके बाद मुल्क भर में आतंकवाद के नाम पर आला तालीम याफ्ता मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारी का सिलसिला शुरू हुआ। उस वक़्त प्रदेश से लिए केंद्र तक खुदसाख्ता सेकुलर पार्टियां हुकूमत मे थीं और मुसलमानो के मज़हबी तालीम याफ्ता नौजवानों/उलमाओं जैसे खालिद मुजाहिद, तारिक़ क़ासमी, मुफ़्ती अबुल बशर जैसे ओलमा के बाद बटला हाउस एनकाउन्टर की आड़ में बारी थी मॉडर्न और प्रोफेशनली एडुकेटेड मुस्लिम नौजवानों की और उन्हें शिकार बनाना शुरू हुआ था।



इन हालात में और तमाम सियासी रहनुमाओं की खामोशी से आजिज़ आम मुसलमानो ने ओलमा की क़यादत में इस लड़ाई को Rashtriya Ulama Council  के बैनर तले लड़कर पूरे मुल्क में ज़ुल्म के खिलाफ "बटला हाउस एनकाउंटर" को (Symbol of Resistance) मज़ाहमत की आलामत बना दिया, जो आज भी क़ायम है।


बटला हॉउस एनकाउन्टर के बाद हुए आंदोलन और मुसलमानों के सियासी बेदारी ने इस तहरीक के ज़रिए मुसलमानो को दहशतगर्दी के नाम पर बदनाम और की उनकी नौजवान नस्लों की जिंदगियां बर्बाद करने के लिए "स्टेट स्पॉन्सर्ड कैंपेन" पर काफी हद तक रोक लगा दी और आतंकवाद के नाम पर मुसलमानो के demonisation और isolation को रोक दिया।


ये आपके आंदोलन की ताकत है कि बटला हॉउस के नाम पर फ़िल्म तक बनी और आज भी हर चुनाव में बटला हॉउस का ज़िक्र आ ही जाता है वरना इस मुल्क में मुसलमानो के एनकाउन्टर, आतंकवाद का इल्जाम, नसलकुशी और दंगों जैसे न जाने कितने ज़ुल्म हुए पर मुकम्मल इंसाफ कहीं न मिला और न ही किसी को ये याद हैं।


 हम मज़लूमों को इंसाफ तो अबतक न दिला सके पर ज़ालिम के ज़ुल्म की दास्तान तो सबकी ज़बान पर ले आये, वरना इस मुल्क में आज तुम्हारी दास्तान भी नही है दस्तानों में। लड़ेंगे क्योंकि हम ज़िंदा है।

तलहा रशादी

राष्ट्रीय महासचिव 

राष्ट्रीय उलेमा कौंसिल 


#BatlaHouse #BatlaHouseEncounter 

#Justice #YouthVoice #RUC #Resistance

No comments:

Post a Comment