लगभग 1 महीना पहले जिस दिन से Rashtriya Ulama Council ने महाराष्ट्र में एक कामियाब प्रोग्राम किया है उसी रोज़ से बहुत से लोगों को तकलीफ होने लगी है, कुछ मिल्ली दानिशवरान का "लिबेरलइज़्म"वाला दर्द तो समझ आता है पर एक बड़ी तादाद उन नौनिहाल जंगजुओं की है जो एक मख़सूस मिल्ली जमात के कारकुनान हैं। उसी रोज़ से एक आर्गनाइज्ड तरीके से हमारी क़यादत, Maulana Aamir Rashadi Madni और RUC पे लगातार इल्ज़ामात, बोहतान, किरदारकुशी, छींटाकशी और ओछे कमेंट्स किये जा रहे हैं, जहां "सेकुलर दल" के लोग BJP का एजेंट, वोट कटुआ, सौदागर का खिताब देते नही थक रहे हैं तो "अपने दल" वाले मोली सांप, ज़मानत ज़प्त, मुनाफ़िक़, ओलमा कैन्सिल वगैरा जैसे तमगों से नवाज़ रहे हैं।
गर सवाल ये है कि हम क्यों महाराष्ट्र इलेक्शन लड़ रहे हैं जबकि BJP को रोकना है? तो जवाब ये है कि इसी BJP को रोकने के लिए मिल्लत के बड़ों और दानिशवरों के कहने पे हमने 2019, 2020, 2022 और 2024 असेंबली और पार्लियामेंट्री चुनावो में UP समेत मुल्क भर में हमने या तो हिस्सा ही नही लिया या न के बराबर हिस्सा लिया ताकि BJP रुक जाए पर अबतक न रुक सकी।
तो आगे क्या करते? एक पॉलिटिकल पार्टी अगर चुनाव ही न लड़ेगी तो क्या करेगी? पूरे 5 साल हमारे कार्यकर्ता आपनी हैसियत के मुताबिक अवाम के बीच रहते हैं, उनके हुक़ूक़ के लिए जीते मरते हैं, उनके काम आते हैं और जब चुनाव मे खुद अवाम से एक वोट लेने का मौका आये तो चुनाव न लड़ने की राय आ जाती है। इतने सारे चुनावो में इसी "मसलेहत" से सीट नही नही लड़े तो आजतक किसी दानिश्वर या मुशीर ने तारीफ या सताइश में एक जुमला तक नही लिखा और अब महाराष्ट्र में 288 में से सिर्फ 7 सीट लड़ रहे हैं तो दिन रात तनक़ीद की जा रही है। हमने तो यहां मुम्बई में "गैरों" से लेकर "अपनो" तक से इत्तेहाद की तमाम कोशिश की, "गैर" तो अपनो से इत्तेहाद करने को तैयार नही है पर यहां तो "अपने" भी अपनो से इत्तेहाद को तैयार नही हैं। क़ौम को मुत्तहिद करने का सबसे बुलंद नारा देने वाले आपस मे क़यादतों को मुत्तहिद करने को तैयार नही हैं।
मानते हैं हम कि पार्लियामेंट के फ़सील से क़ौम की आवाज़ न बुलंद कर सके क्योंकि मौका नही मिला और न ही गोदी मीडिया की नज़रे इनायत हासिल कर सके कि मिल्ली मसाएल पर आवाज़ उठा सुर्ख़ियों में छा पाते पर अपनी हैसियत भर हमारी क़यादत ने हर मुश्किल वक़्त पर मिल्लत की आवाज़ बुलंद की और सिर्फ आवाज़ ही नही बल्कि बिना किसी MP/MLA/हुकूमत की नज़रे इनायत के भी सैकड़ों को आँसू पोछे, मिल्ली मसाएल पर बड़े बड़े आंदोलन किये और दिल्ली तक हिला डाला जिसकी तारीखी मिसालें हैं और उन मुद्दों का ज़िक्र PM की ज़बान तक पहुंचाया पर क़ौम की आँखों का तारा न ब सके क्योंकि हमेशा लड़ाई हुक़ूक़ की लड़ी सत्ता की नही।
हमे लगातार सोशल मीडिया पर ज़लालत भरे लहजे में चैलेंज किया जा रहा है कि महाराष्ट्र में सभी ज़मानत ज़ब्त होंगी, हो सकता है ये हो, पर इससे आप क्यों खुश हैं? क्या आपके "इत्तेहाद" और "मुस्लेमीन" में हम नही आते? ये भी बताइए कि क्या हमारे किसी कारकुन ने कभी UP के 2022 के इलेक्शन में आपकी सभी सीटों पर ज़प्त हुई ज़मानत का मज़ाक उड़ाया? जबकि उस वक़्त UP में आप अपनी शोहरत के शबाब पर थे। फ़िल्हाक महाराष्ट्र का ही ज़िक्र करें तो 2019 के इलेक्शन में कुर्ला विधानसभा सीट पर आप 17,000 वोट पाते हैं और 2024 के लोकसभा इलेक्शन में उसी कुर्ला की लोकसभा सीट पर जिसमे 5 और विधानसभा जुड़ जाती हैं आपके प्रत्याशी 1500 वोट पाता है तो क्या हम आपसे कहें कि आप इस बार 100 का आंकड़ा पर नही करेंगे या आप महाराष्ट्र में चुनाव मत लड़िये जिस तरह से आपके हामियों की एक बड़ी तादाद हमे कह रही है, डरा रही है, तंज कस रही है।
बातें बहुत सी हैं पर Rashtriya Ulama Council की हमारी क़यादत ने हमेशा पार्टी के मफाद से ऊपर मिल्लत के मफाद को तरजीह दी है और इसीलिये हम कल भी, आज भी और आइंदा भी इत्तेहाद की कोशिश जारी रखेंगे और अपने सियासी वजूद और पहचान को भी कायम रखेंगे चाहे कोई कितना ही ट्रोल करवा लें। और ये भी तय है कि हालात ए हाज़रा के मद्देनज़र मिल्लत मुत्तहिद होने को तैयार बैठी है, अब क़यादतों को मुत्तहिद होना है।
अगर मिल्लत के दर्द को महसूस करते हुए एक मुर्दा शख्स को गर कंधा देने के लिए हम बिना बुलाये-समझाए साथ चल सकते हैं तो आइए ज़िंदा लोगों के लिए भी कंधे से कंधा मिला कर चलें और गर अब भी न साथ होंगे तो, "हमे तो अभी और रुसवा होना ही है"।
हुजैफा रशादी
राष्ट्रीय प्रवक्ता
राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल

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