आरक्षण और परिसीमन:- एक हथियार मुसलमानों के खिलाफ
भारत में मुसलमानों को राजनीतिक रूप से अलग थलग करके संसद और विधानसभाओं में पहुंचने के लिए मुस्लिम असर वालीं लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों को या तो मुसलमान क्षेत्रों को बांट कर परिसीमन किया जाता है जिससे उनके वोट बेअसर हो जाएं या ऐसा ना कर सके तो मुसलमानों के प्रभाव वाली सीटों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित करके मुसलमानों को संसदीय राजनीति से बाहर कर दिया जाता है।
इस देश की कुल 543 लोकसभा सीटों में से कुल 131 सीटें अर्थात 24.03% आरक्षित हैं जिनमें 84 सीटें अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं।
परिसीमन और ऐसे आरक्षण से मुसलमानों का राजनीतिक बहिष्कार उसी के बराबर 20% की आबादी के लिए आरक्षण देकर किया जाता रहा है और यह खेल कांग्रेस के दौर से शुरू हुआ और अब भाजपा के राज में बदस्तूर जारी है।
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति बहुल सीटें इस देश में कितनी हैं? वहां की लोकसभा और विधानसभाओं की सीटें इनके लिए आरक्षित हों तो बात समझ में आती हैं मगर जहां इनकी आबादी नहीं हैं और मुस्लिम उस सीट पर प्रभावी हैं उन सीटों को भी आरक्षित करना देश की संसद और विधानसभाओं से मुसलमानों को बाहर रखने की साज़िश के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
आप केवल उत्तर प्रदेश का ही अध्ययन करिए तो यहां की 80 लोकसभा सीटों में से 17 सीटें , नगीना, बुलंदशहर, हाथरस , आगरा , शाहजहांपुर, हरदोई, मिश्रिख, मोहनलालगंज, इटावा, जालौन , कौशांबी, बाराबंकी, बहराइच, बांसगांव, लालगंज, मछलीशहर , राबर्ट्सगंज आरक्षित हैं
और इन 17 सीटों में से अधिकांश मुस्लिम प्रभाव वाली सीटें हैं और किसी किसी सीट पर तो मुस्लिम 50% तक हैं जो किसी को भी जिताने की शक्ति रखते हैं।
कुछ उदाहरण देखिए
नगीना मुस्लिम बहुल लोकसभा सीट है जहां अधिकारिक रूप से 50% मुसलमान हैं, रिज़र्व कर दी गयी कि कोई मुसलमान जीत कर संसद ना पहुंचे।
बुलंदशहर में 35% से अधिक मुसलमान हैं जो किसी को भी संसद में पहुंचा सकते हैं, उसे भी आरक्षित कर दी गई।
बहराइच में 35% मुस्लिम हैं, इसी कारण से यह सीट भी आरक्षित कर दी गई।
यही खेल, आसाम , पश्चिम बंगाल बिहार इत्यादि इत्यादि जगहों पर खेला जाता रहा है खेला जा रहा है।
मज़ेदार बात यह है कि कांशीराम और मायावती की दलित राजनीति के चरम पर होने के बावजूद इन 17 आरक्षित सीटों पर बसपा कभी भी 2 सीटों से अधिक पर जीत दर्ज नहीं कर पाई जबकि भाजपा 2014 में सभी 17 सीटें जीत गयी थी।
यही खेल लोकसभा और विधानसभा सीटों के परिसीमन में भी होता है और किसी सीट पर मुस्लिम असरकारक है तो उसके इलाके उस सीट से काट कर दूसरी सीट में मिला दिए जाते हैं।
उदाहरण के लिए इलाहाबाद पश्चिमी की सीट को देखिए, इलाहाबाद पश्चिमी सीट पर अतीक अहमद 3 बार निर्दलीय, एक बार अपनी दल से और एक बार समाजवादी पार्टी से लगातार विधायक चुने जाते रहे हैं।
परिसीमन में अतीक अहमद की इस इलाहाबाद पश्चिमी सीट के तमाम मुस्लिम इलाकों को काट कर इलाहाबाद दक्षिण और चायल विधानसभा सीटों में मिला दिया गया और इलाहाबाद दक्षिण और चायल विधानसभा सीटों के भगवा इलाकों को काट कर इलाहाबाद पश्चिम विधानसभा सीट में मिला दिया गया।
परिणाम यह हुआ कि अतीक अहमद फिर यहां कभी भी चुनाव नहीं जीत पाए और उनका भयानक अंत हुआ। और राजा भैया भाजपा और समाजवादी पार्टी के दुलारे बने हुए हैं।
कहने का मतलब यह है कि आप इस देश में मुसलमान होने को इतना आसान मत समझिए, वह चारों तरफ और लोकतंत्र के चारों स्तंभों की साजिशों में घिरा हुआ है।
Mohd Zahid की FB वॉल से,

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