मुल्क के मुसलमान और सेक्युलर पार्टियां
ज़ाकिर हुसैन
अल फलाह फ्रंट
खाकसार की तहरीरों की बुनियाद बनाकर अक्सर लोग नाचीज़ को सेक्युलर मोखालिफ़ बताने की जो कोशिश करते हैं,राकिम इससे इत्तेफ़ाक़ नही रखता।उम्मीद है ,अगर मेरा क़लम इस तहरीर के सफर में कहीं अख़लाक़ और तहज़ीब को रौंदने की कोशिश करे तो उम्मीद है आप शिकव्ह और मलाल की चादर ज़ेबतन करने के अमल से खुद को महफूज़ रखेंगे।आप सब का एहतराम मलहूज़ रखते हुए अर्ज़ करना चाहूंगा कि माज़ी की यादें गवाह हैं सेक्युलर सियासी जमातों का मुसलमानों के तईं सर्द रवय्ये की।बटला हाउस इनकाउंटर हुआ,मर्कज़ और सूबे में कांग्रेस की सरकार थी,मुल्क के मुसलमान और इंसाफ पसन्द अफ़राद इस एनकांउटर की ज्यूडिशियल इंकावरी की मांग करते रहे,लेकिन कांग्रेस खामोश और मुसलमान अपने बहते अश्क को रोकने में मसरूफ।कांग्रेस ने बटला हाउस इनकाउंटर की जांच न करवाकर नो सिर्फ मुल्क के मुसलमानों और इंसाफ पसन्द अफ़राद की जज़्बात का ही क़त्ल नहीं किया बल्कि आईन-ए-हिन्द के तक़ाज़ों को पूरा करने में भी रखना डाला।क्योंकि आईन-ए-हिन्द की मुरवज्जा क्रिमनिल प्रोसिजर कोड की दफा 176 के तहत किसी भी पुलिस टकराव की मजिस्ट्रेट से जांच करवाना लाज़मी है।आर्टिकल 341 पर मज़हबी पाबन्दी आयद करके कांग्रेस ने मुसलमानों को रिज़र्वेशन से महरूम कर दिया और यहां भी आईन-ए-हिन्द की खेलाफ वर्ज़ी की,क्योंकि आईन-ए-हिन्द की दफा 14,15,16 और 25 में मुल्क के तमाम शहरियों के साथ यकसां बर्ताव की बात कही गयी है।जगमोहन कमीशन की रिपोर्ट बताती है कि 1969 में गुजरात के अहमदाबाद में हुये फिरकावाराना फसादात में कम से 5 हज़ार मुसलमानों के जिस्म ख़ाक -ओ-खून में मिल गये।उस वक़्त गुजरात में कांग्रेस के हतेन्द्र भाई देसाई और मर्कज़ में इंदिरा गांधी एकतेदार पर फ़ायज़ थीं।लेकिन लब खामोश थे और इंसानियत चीख़ रही थी।हम मुसलमानों से सेक्युलर जमातों से किनाराकशी की बात नही करते बल्कि उनसे अपना हक़ और हिसाब मांगने की बात करते हैं।समाजवादी पार्टी ने 2012 के इंतेखाब में मुसलमानो को 18 फीसद रिज़र्वेशन देने का वादा किया था लेकिन इंतेखाब आया ,समाजवादी पार्टी की हुकुमत बनी लेकिन मुसलमानों को रेज़र्वशन नही मिला।रही बात सिर्फ मुसलमानो के इशूज़ पर लिखने की तो मुसलमानों के इतने मसाएल हैं कि हमें कहीं और नज़र-ए-करम डालने की फुर्सत कहाँ।बहरहाल एक बात कहना चाहूंगा कि हमारा लाख एक दूसरे से एखतेलाफ़ हो लेकिन हम अपने जाती रिश्ते को कभी ख़राब न करें।हमें उम्मीद है जो मुसलमान आज इंतेशार -ओ-इफ़्तराक की दुनिया में बदमस्त हैं वह क़ौम में इत्तेहाद के अंदर पैग़ाम को आम करके क़ौम को पसमांदगी के दलदल से निकालेंगे।इन शा अल्लाह
ज़ाकिर हुसैन
अल फलाह फ्रंट
Email:hussainzkir650@gmail. com
संपर्क नम्बर :8368463763
ज़ाकिर हुसैन
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खाकसार की तहरीरों की बुनियाद बनाकर अक्सर लोग नाचीज़ को सेक्युलर मोखालिफ़ बताने की जो कोशिश करते हैं,राकिम इससे इत्तेफ़ाक़ नही रखता।उम्मीद है ,अगर मेरा क़लम इस तहरीर के सफर में कहीं अख़लाक़ और तहज़ीब को रौंदने की कोशिश करे तो उम्मीद है आप शिकव्ह और मलाल की चादर ज़ेबतन करने के अमल से खुद को महफूज़ रखेंगे।आप सब का एहतराम मलहूज़ रखते हुए अर्ज़ करना चाहूंगा कि माज़ी की यादें गवाह हैं सेक्युलर सियासी जमातों का मुसलमानों के तईं सर्द रवय्ये की।बटला हाउस इनकाउंटर हुआ,मर्कज़ और सूबे में कांग्रेस की सरकार थी,मुल्क के मुसलमान और इंसाफ पसन्द अफ़राद इस एनकांउटर की ज्यूडिशियल इंकावरी की मांग करते रहे,लेकिन कांग्रेस खामोश और मुसलमान अपने बहते अश्क को रोकने में मसरूफ।कांग्रेस ने बटला हाउस इनकाउंटर की जांच न करवाकर नो सिर्फ मुल्क के मुसलमानों और इंसाफ पसन्द अफ़राद की जज़्बात का ही क़त्ल नहीं किया बल्कि आईन-ए-हिन्द के तक़ाज़ों को पूरा करने में भी रखना डाला।क्योंकि आईन-ए-हिन्द की मुरवज्जा क्रिमनिल प्रोसिजर कोड की दफा 176 के तहत किसी भी पुलिस टकराव की मजिस्ट्रेट से जांच करवाना लाज़मी है।आर्टिकल 341 पर मज़हबी पाबन्दी आयद करके कांग्रेस ने मुसलमानों को रिज़र्वेशन से महरूम कर दिया और यहां भी आईन-ए-हिन्द की खेलाफ वर्ज़ी की,क्योंकि आईन-ए-हिन्द की दफा 14,15,16 और 25 में मुल्क के तमाम शहरियों के साथ यकसां बर्ताव की बात कही गयी है।जगमोहन कमीशन की रिपोर्ट बताती है कि 1969 में गुजरात के अहमदाबाद में हुये फिरकावाराना फसादात में कम से 5 हज़ार मुसलमानों के जिस्म ख़ाक -ओ-खून में मिल गये।उस वक़्त गुजरात में कांग्रेस के हतेन्द्र भाई देसाई और मर्कज़ में इंदिरा गांधी एकतेदार पर फ़ायज़ थीं।लेकिन लब खामोश थे और इंसानियत चीख़ रही थी।हम मुसलमानों से सेक्युलर जमातों से किनाराकशी की बात नही करते बल्कि उनसे अपना हक़ और हिसाब मांगने की बात करते हैं।समाजवादी पार्टी ने 2012 के इंतेखाब में मुसलमानो को 18 फीसद रिज़र्वेशन देने का वादा किया था लेकिन इंतेखाब आया ,समाजवादी पार्टी की हुकुमत बनी लेकिन मुसलमानों को रेज़र्वशन नही मिला।रही बात सिर्फ मुसलमानो के इशूज़ पर लिखने की तो मुसलमानों के इतने मसाएल हैं कि हमें कहीं और नज़र-ए-करम डालने की फुर्सत कहाँ।बहरहाल एक बात कहना चाहूंगा कि हमारा लाख एक दूसरे से एखतेलाफ़ हो लेकिन हम अपने जाती रिश्ते को कभी ख़राब न करें।हमें उम्मीद है जो मुसलमान आज इंतेशार -ओ-इफ़्तराक की दुनिया में बदमस्त हैं वह क़ौम में इत्तेहाद के अंदर पैग़ाम को आम करके क़ौम को पसमांदगी के दलदल से निकालेंगे।इन शा अल्लाह
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